June 4, 2026
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अद्भुत, अलौकिक, परंतु पूर्णतः सत्य — गोरखपुर में श्रीकृष्ण ने दिया छाया रूप में साक्षात् दर्शन

 

 

 

 

श्रीमद्भागवत कथा महापुराण के दौरान अंतर्राष्ट्रीय बाल व्यास श्वेतिमा माधव प्रिया के श्रीमुख से श्रीकृष्ण जन्मोत्सव प्रसंग के समय घटित हुआ दिव्य चमत्कार, हजारों श्रद्धालु बने साक्षी

 

 

गोरखपुर:

यह केवल एक कथा नहीं थी, यह लीला थी। यह केवल दीप नहीं था, यह प्रभु का प्रकट मार्ग था।

 

स्वर सागर संस्था द्वारा रामलीला मैदान मानसरोवर गोरखनाथ में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा महापुराण के चतुर्थ दिवस पर ऐसा अलौकिक चमत्कार घटित हुआ, जिसने हर श्रद्धालु के हृदय को भीतर तक छू लिया। कथा वाचन कर रही थीं अंतर्राष्ट्रीय बाल व्यास कुमारी श्वेतिमा माधव प्रिया, जिन्होंने जब श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का भावपूर्ण प्रसंग सुनाया, उसी क्षण जैसे साक्षात् श्रीकृष्ण स्वयं आकर कथा को अमर कर गए।

 

ज्यों ही आरती का दीप प्रज्वलित हुआ, कथा मंडप में उपस्थित दीप की लौ में श्रीकृष्ण का दिव्य छाया रूप प्रकट हो गया। यह कोई मनगढंत दृश्य नहीं, बल्कि हजारों श्रद्धालुओं की आत्मिक अनुभूति थी, जिसे उन्होंने खुली आँखों से देखा और आत्मा से अनुभव किया। पूरा पांडाल भक्ति, आश्चर्य और आनंद से भर उठा — “जय श्रीकृष्णा” और “राधे-राधे” के जयघोष से वातावरण गूंज उठा।

 

मुख्य यजमान के रूप में स्वर सागर संस्था की सचिव सुश्री सुनीशा श्रीवास्तव एवं श्री सुनील श्रीवास्तव ने पूजन-अर्चन किया और आयोजन को भक्तिपूर्ण गरिमा प्रदान की।

 

कथा में विशेष रूप से उपस्थित श्रद्धालुगणों में प्रमुख थे:

डा. राम कृपाल राय, विष्णु शंकर श्रीवास्तव, डा. अमिताभ पाण्डेय, वागीश चंद, निधि श्रीवास्तव, डा. अनीता पाल सिंह, एकता उपाध्याय, प्रशांत पाण्डेय, दीनानाथ सिंह, अर्चना दूबे, डा. यस सी श्रीवास्तव, नीतू, रंजना सिंह, प्रेमलता रस विंदु, विशाल दूबे, आचार्य गौरव पाण्डेय, सह आचार्य सचिन पाण्डेय, मदन मोहन मालवीय, सुमित सिंह, नन्दन मिश्रा एवं अन्य हजारों श्रद्धालु, जिन्होंने उस छाया रूप श्रीकृष्ण के दर्शन किए।

 

इस दौरान अंतर्राष्ट्रीय बाल व्यास श्वेतिमा माधव प्रिया के पिता डा. सौरभ पाण्डेय, माता डा. रागिनी पाण्डेय, गुरु बाबा, कनक लता, हर्ष, डब्लू शुक्ला, अनीता श्रीवास्तव भी उक्त दिव्य रूप का दर्शन करने वाले सौभाग्यशाली रहे।

 

यह केवल एक चमत्कारी क्षण नहीं था, यह आस्था का आशीर्वाद था। यह उस दिव्यता का संकेत था कि जब भक्ति सच्ची होती है, जब भाव निष्कलंक होते हैं — तब ईश्वर किसी न किसी रूप में प्रकट होकर उत्तर देते हैं।

 

यह घटना न केवल गोरखपुर, बल्कि सम्पूर्ण भारत और विश्व के लिए एक अद्वितीय भक्ति प्रेरणा है — जो यह सिद्ध करती है कि ईश्वर अभी भी जीवित हैं, वे हमारे भीतर और हमारे चारों ओर हैं — बस उन्हें देखने के लिए श्रद्धा भरी दृष्टि चाहिए।

 

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